Harivamsha Purana

भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे

Containing 83 sacred Sanskrit shlokas with multi-author commentaries and translations.

Harivamsha Purana

भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 1

३.१३२.२२ - १. कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका, जिह्वामूल और हृदय-ये वर्णों के उच्चारण के आठ स्थान हैं :- २. पाणिनीय शिक्षा में तिरसठ वर्णो की गणना इस प्रकार दी गयी है - इक्कीस स्वर, पच्चीस स्पर्श, आठ यादि, चार यम, अनुस्वार, विसर्ग, क, प तथा दुःस्पृष्ट ये सब मिलाकर तिरसठ बर्ण हैं ।

इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है--``अ इ उ ऋ ये चार स्वर हस्व, दीर्घ और प्लुत के भेद से तीन-तीन तरह के माने गये है, अतः ये बारह हुए ।

लृकार का केवल ह्रस्व रूप ही ग्रहण किया गया है - इस प्रकार ये तेरह स्वर हुए ।

इनके सिवा, ए ओ ऐ औ'' ये दीर्घ और प्लुत के भेद से दो-दो प्रकार के हैं,अतः आठ हुए ।

पूर्वोक्त १३ और ये ८ मिलकर २१ स्वर होते हैं ।

``क'' से लेकर ``म'' तक २५ अक्षर स्पर्श कहलाते हैं ।

इनको मिलाने से ४६ अक्षर हुए ।

``य'' से देकर ``ह'' तक के आठ अक्षरों को जोड़ लेने पर इनकी सङ्ख्या ५४ होती है ।

प्रतिशाख्य के अनुसार चार यम होते हैं ।

यथा- पलिक्क्नी'' चख्ख्नतुः अग्ग्निः ``घ् घ्नन्ति'' इन उदाहरणों में क् ख् ग् घ्'' से परे जो इन्हीं के सदृश वर्ण है, इन्हीं की ``यम'' संज्ञा हैं ।

इन चार यमों को जोड लेने से अक्षरों की सङ्ख्या ५८ तक पहुँचती है ।

इनके सिवा, अनुस्वार (अं ), विसर्ग (अः )क (जिह्वामूलीय ), प (उपध्मानीय )तथा दुःस्पृष्टवर्ण (दो स्वरों के मध्य में वर्तमान लकार )--ये पाँच अक्षर और हैं ।

इन सबका योग तिरसठ होता है ।

ये ही तिरसठ अक्षर हैम् ।

त्रिपुरवधवृत्तान्तः Description of elimination of demon tripura त्रिपुरवधस्य कथा जनमेजय उवाच ।

त्र्यक्षाद् वधमहं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।

त्रयाणां पुरसंज्ञानां खेचराणां समासतः ॥ १॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 2

वैशम्पायन उवाच ।

श‍ृणु विस्तरतः सर्वं यन्मां पृच्छसि नैधनम् ।

दैत्यानां बाहुबलिनां सर्वप्राणिविरोधिनाम् ॥ २॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 3

शङ्करेण वधं राजञ्शूलैस्त्रिभिरजिह्मगैः ।

कृतं पुरासुरेन्द्राणां सर्वभूतवधैषिणाम् ॥ ३॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 4

त्रिपुरं पुरुषव्याघ्र वृहद्धातुसमीरितम् ।

विक्रामति नभोमध्ये मेघवृन्दमिवोत्थितम् ॥ ४॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 5

प्राकारेण प्रवृद्धेन काञ्चनेन विराजता ।

मणिभिश्च प्रकाशद्भिः सर्वरत्नैश्च तोरणैः ॥ ५॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 6

बभासे नभसो मध्ये श्रिया परमया ज्वलत् ।

गन्धर्वाणामिवोदग्रं कर्मणा साधितं पुरम् ॥ ६॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 7

वाजिनः पक्षसंयुक्ता वहन्ति बलदर्पिताः ।

पुरं प्रभाकरश्रेष्ठं मनोभिः कामबृंहणैः ॥ ७॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 8

धावन्ति ह्रेषमाणास्ते विक्रमैः प्राणसम्भृतैः ।

आहूयत इवाकाशं खुरैः श्यामदलप्रभैः ॥ ८॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 9

वायुवेगसमैर्वेगैः कालयन्त इवाम्बरम् ।

असुराः समदृश्यन्त चक्षुर्भिर्विदितात्मभिः ॥ ९॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 10

ऋषिभिर्ज्वलनप्रख्यैस्तपसा दग्धकिल्बिषैः ।

गीतवादित्रबहुलं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ ३.१३३.१०॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 11

चित्रायुधसमाकीर्णैः प्रतप्तकनकप्रभैः ।

भवनैर्बहुभिश्चैव प्रांशुभिः समलङ्कृतैः ॥ ११॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 12

देवेन्द्रभवनाकारैः शुशुभे तन्महाद्युति ।

प्रासादाग्रैः प्रवृद्धैश्च कैलासशिखरप्रभैः ॥ १२॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 13

शुशुभे दैत्यनगरं बहुसूर्यमिवाम्बरम् ।

वराट्टालकसम्पन्नं तप्तकाञ्चनसप्रभम् ॥ १३॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 14

प्रदीप्तमिव तेजोभी रराजाथ महाप्रभो ।

क्ष्वेडितोत्क्रुष्टबहुलं सिंहनादविनादितम् ॥ १४॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 15

बभौ वल्गुजनाकीर्ण वनं चैत्ररथं यथा ।

समुच्छ्रितपताकं तदसिभिश्च विराजितम् ॥ १५॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 16

रराज त्रिपुरं राजन् महाविद्युदिवाम्बरे ।

सूर्यनाभश्च दैत्येन्द्रश्चन्द्रनाभश्च भारत ॥ १६॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 17

तथान्ये च महावीर्या दानवा बलदर्पिताः ।

ममृदुश्च बभञ्जुश्च मोहिताः परमेष्ठिना ॥ १७॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 18

पन्थानं देवगमनं पितृयानं च भारत ।

तैरेवमसुराग्रैश्च प्रगृहीतशरासनैः ॥ १८॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 19

दानवैर्नरशार्दूल देवयाने महापथे ।

पितृवह्नियलोपेते हृते भरतसत्तम ॥ १९॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 20

ब्रह्माणमभ्यधावन्त सर्वे सुरगणास्तथा ।

विवर्णवदना दीनाश्छिन्ने वै गतिकर्मणि ॥ ३.१३३.२०॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 21

अब्रुवंश्च गताः स्थित्वा स्वरेणार्तनिनादिना ।

हन्यामहे शत्रुगणैर्भागोच्छेदेन भागद ॥ २१॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 22

तेषां चैव वधोपायं वदस्व वदतां वर ।

यं ज्ञात्वा बाहुबलिनो बाधेम समरे परान् ॥ २२॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 23

सान्त्वयित्वा तु वरदो ब्रह्मा प्रोवाच देवताः ।

श‍ृणुध्वं देवताः सर्वाः शत्रुप्रतिकृतिं पराम् ॥ २३॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 24

अवध्या दानवाः सर्वे ऋते शङ्करमव्ययम् ।

प्रतिगृह्य च तद् वाक्यं मनोभिर्वाग्भिरेव च ॥ २४॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 25

भूमौ प्रपेदिरे सर्वे सह रुद्रैश्च भारत ।

विन्ध्यपादे च मेरौ च मध्ये च पृथिवीतले ॥ २५॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 26

तपसोग्रेण योगज्ञा सर्वे ते मुनयोऽभवन् ।

काश्यपेयं हरं प्राप्ता जपन्तो ब्रह्मसंहिताम् ॥ २६॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 27

तेषां च परदाराणामभवद् वन्ध्यता जने ।

विन्यस्तदर्भनिचये ताम्रलोहं च भूषणम् ॥ २७॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 28

परिधानानि चर्माणि मृदूनि च शुभानि च ।

स्वयं मृतानां कृष्णानां मृगाणां कुरुसत्तम ॥ २८॥

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भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 29

गृहीतानि विमुक्तानि देहेभ्यो वनचारिणाम् ।

अन्तरिक्षमथोपेत्य विविशुर्माययाऽऽवृताः ॥ २९॥

Harivamsha Purana

भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 30

हरालयं सुराः सर्वे व्याघ्रचर्भनिवासिनः ।

प्रणिपत्याथ ते दीना भगवन्तं जगत्पतिम् ॥ ३.१३३.३०॥