भविष्यपर्व, अध्याय 133: त्रिपुरवधे, Verse 1
३.१३२.२२ - १. कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका, जिह्वामूल और हृदय-ये वर्णों के उच्चारण के आठ स्थान हैं :- २. पाणिनीय शिक्षा में तिरसठ वर्णो की गणना इस प्रकार दी गयी है - इक्कीस स्वर, पच्चीस स्पर्श, आठ यादि, चार यम, अनुस्वार, विसर्ग, क, प तथा दुःस्पृष्ट ये सब मिलाकर तिरसठ बर्ण हैं ।
इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है--``अ इ उ ऋ ये चार स्वर हस्व, दीर्घ और प्लुत के भेद से तीन-तीन तरह के माने गये है, अतः ये बारह हुए ।
लृकार का केवल ह्रस्व रूप ही ग्रहण किया गया है - इस प्रकार ये तेरह स्वर हुए ।
इनके सिवा, ए ओ ऐ औ'' ये दीर्घ और प्लुत के भेद से दो-दो प्रकार के हैं,अतः आठ हुए ।
पूर्वोक्त १३ और ये ८ मिलकर २१ स्वर होते हैं ।
``क'' से लेकर ``म'' तक २५ अक्षर स्पर्श कहलाते हैं ।
इनको मिलाने से ४६ अक्षर हुए ।
``य'' से देकर ``ह'' तक के आठ अक्षरों को जोड़ लेने पर इनकी सङ्ख्या ५४ होती है ।
प्रतिशाख्य के अनुसार चार यम होते हैं ।
यथा- पलिक्क्नी'' चख्ख्नतुः अग्ग्निः ``घ् घ्नन्ति'' इन उदाहरणों में क् ख् ग् घ्'' से परे जो इन्हीं के सदृश वर्ण है, इन्हीं की ``यम'' संज्ञा हैं ।
इन चार यमों को जोड लेने से अक्षरों की सङ्ख्या ५८ तक पहुँचती है ।
इनके सिवा, अनुस्वार (अं ), विसर्ग (अः )क (जिह्वामूलीय ), प (उपध्मानीय )तथा दुःस्पृष्टवर्ण (दो स्वरों के मध्य में वर्तमान लकार )--ये पाँच अक्षर और हैं ।
इन सबका योग तिरसठ होता है ।
ये ही तिरसठ अक्षर हैम् ।
त्रिपुरवधवृत्तान्तः Description of elimination of demon tripura त्रिपुरवधस्य कथा जनमेजय उवाच ।
त्र्यक्षाद् वधमहं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
त्रयाणां पुरसंज्ञानां खेचराणां समासतः ॥ १॥