अथ पञ्चमोध्यायः (Equanimity and Self-Absorption), Verse 1
अविलासविलासनिराकरणं कथमक्षरबिन्दुसमुच्चरणम् ॥१॥
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अविलासविलासनिराकरणं कथमक्षरबिन्दुसमुच्चरणम् ॥१॥
त्वमुपाधिविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२॥
यदि चैकविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥३॥
पदसन्धिविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥४॥
न हि कालविकालसमाधिरिति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥५॥
न हि कारणकार्यविभाग इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥६॥
न हि वर्तुलकोणविभाग इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥७॥
इह सर्वविसर्वविहीन इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥८॥
अरिमित्रविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥९॥
इह सर्वनिरन्तरमोक्षपदं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१०॥
ननु सर्गविसर्गविहीन इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥११॥
इति शुद्धनिरञ्जनसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१२॥
इह बोधतमं खलु मोक्षसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१३॥
यदि सर्वविवर्जितसर्वसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१४॥
इह बोधविबोधविहीनपरं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१५॥
यदि केवलमात्मनि सत्यमिति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१६॥
इह केवलनिश्चलजीव इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१७॥
यदि चैकनिरन्तरबोध इति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१८॥
न हि पूर्णपदं न हि रिक्तपदं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥१९॥
यदिभेदविभेदविहीनसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२०॥
द्विपदादिविवर्जितसर्वचिते किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२१॥
दिनरात्रिविवर्जितसर्वगतं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२२॥
न हि तर्कवितर्कसमागमनं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२३॥
न हि केवलसत्यनिराकरणं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२४॥
अभिधानविधानविहीनपरं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२५॥
गतसारविसारविकारसमं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२६॥
इह कामविकामविरागतरं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२७॥
गुरुशिष्यविवर्जिततत्त्वपरं किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२८॥
अविचारविचारविहीनमिति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥२९॥
विषये करणत्वमसत्यमिति किमु रोदिषि मानसि सर्वसमम् ॥३०॥