अथ तृतीयोऽध्यायः (Nature of the Supreme Self), Verse 1
गुणविगुणविहीनं व्यापकं विश्वरूपं कथमहमिह वन्दे व्योमरूपं शिवं वै ॥१॥
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गुणविगुणविहीनं व्यापकं विश्वरूपं कथमहमिह वन्दे व्योमरूपं शिवं वै ॥१॥
एवं विकल्परहितोऽहमलं शिवश्च स्वात्मानमात्मनि सुमित्र कथं नमामि ॥२॥
निर्दीपदीपरहितो हि सदोदितोऽहं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥३॥
निःसारसाररहितं च कथं वदामि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥४॥
नित्यं त्वनित्यमखिलं हि कथं वदामि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥५॥
सत्यं वदामि खलु वै परमार्थतत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥६॥
संविद्धि चैकममलं न हि बन्धमुक्तं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥७॥
आसन्नरूपगहनो न भवामि तात ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥८॥
निर्देहदेहदहनो ज्वलनो भवामि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥९॥
निर्बन्धबन्धदहनो हि हुताशनोऽहं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१०॥
निश्चित्तचित्तरहितो न भवामि वत्स ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥११॥
निर्लोभलोभपदवीति न मे विकल्पो ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१२॥
अज्ञानबन्धनमिदं न च मे कदाचित् ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१३॥
सत्त्वं स्वधर्मजनकं न च मे विकारो ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१४॥
यस्मादहङ्कृतिरियं न च मे कदाचित् ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१५॥
निःसारसारनिधनं न चराचरं हि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१६॥
एवं कथं हि भवतः कथयामि तत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१७॥
प्राक्सम्भवं न च रतं नहि वस्तु किञ्चित् ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१८॥
संसारशोकरहितं त्वहमेव तत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥१९॥
शान्तं पदं हि परमं परमार्थतत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२०॥
कोणं हि वर्तुलमितीह न मे विभागो ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२१॥
निर्व्याकुलं स्थिरमिदं परमार्थतत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२२॥
निष्खण्डखण्डमविचारमनन्तरूपं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२३॥
यद्येकरूपममलं परमार्थतत्त्वं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२४॥
निर्लिङ्गलिङ्गविमलो हि कथं वदामि ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२५॥
निर्देहदेहरहितं सततं विनोदं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२६॥
सत्यानृतेति रचना न च मे विकारो ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२७॥
एवं विकल्परहितं न च भावशुद्धं ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२८॥
संविद्धि सर्वविगतं हि निराकुअलं वै ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥२९॥
एवं निरन्तरसमं हि निराकुलं वै ज्ञानामृतं समरसं गगनोपमोऽहम् ॥३०॥