Atharva Veda

Kaanda 4, Sukta 22

Containing 7 sacred Sanskrit shlokas with multi-author commentaries and translations.

Atharva Veda

Kaanda 4, Sukta 22, Verse 1

अमित्रक्षयणम् ।

इ॒ममि॑न्द्र वर्धय क्ष॒त्रियं॑ म इ॒मं वि॒शामे॑क वृ॒षं कृ॑णु॒ त्वम् ।

निर॒मित्रा॑नक्ष्णुह्यस्य॒ सर्वां॒स्तान् र॑न्धयास्मा अहमुत्त॒रेषु॑

Atharva Veda

Kaanda 4, Sukta 22, Verse 2

एमं भ॑ज॒ ग्रामे॒ अश्वे॑षु॒ गोषु॒ निष्टं भ॑ज॒ यो अ॒मित्रो॑ अ॒स्य ।

वर्ष्म॑ क्ष॒त्राणा॑म॒यम॑स्तु॒ राजेन्द्र॒ शत्रुं॑ रन्धय॒ सर्व॑म॒स्मै

Atharva Veda

Kaanda 4, Sukta 22, Verse 3

अ॒यम॑स्तु धन॑पति॒र्धना॑नाम॒यं वि॒शां वि॒श्पति॑रस्तु॒ राजा॑ ।

अ॒स्मिन्नि॑न्द्र॒ महि॒ वर्चां॑सि धेह्यव॒र्चसं॑ कृणुहि॒ शत्रु॑मस्य

Atharva Veda

Kaanda 4, Sukta 22, Verse 4

अ॒स्मै द्यावा॑पृथिवी॒ भूरि॑ वा॒मं दु॑हाथां घर्म॒दुघे॑ इव धे॒नू ।

अ॒यं राजा॒ प्रि॒य इन्द्र॑स्य भूयात् प्रि॒यो गवा॒मोष॑धीनां पशू॒नाम्

Atharva Veda

Kaanda 4, Sukta 22, Verse 5

यु॒नज्मि॑ त उत्त॒राव॑न्त॒मिन्द्रं॒ येन॒ जय॑न्ति॒ न प॑रा॒जय॑न्ते ।

यस्त्वा॒ कर॑देकवृ॒षं जना॑नामु॒त राज्ञा॑मुत्तमं मा॑न॒वाना॑म्

Atharva Veda

Kaanda 4, Sukta 22, Verse 6

उत्त॑र॒स्त्वमध॑रे ते स॒पत्ना॒ ये के च॑ राज॒न् प्रति॑शत्रवस्ते ।

ए॒क॒वृ॒ष इन्द्र॑सखा जिगी॒वां छ॑त्रूय॒तामा भ॑रा॒ भोज॑नानि

Atharva Veda

Kaanda 4, Sukta 22, Verse 7

सिं॒हप्र॑तीको॒ विशो॑ अद्धि॒ सर्वा॑ व्या॒घ्रप्र॑ती॒कोऽव॑ बाधस्व॒ शत्रू॑न् ।

ए॒क॒वृ॒ष इन्द्र॑सखा जिगी॒वां छ॑त्रूय॒तामा खि॑दा॒ भोज॑नानि